लैंसडाउन-भुला ताल
लैंसडाउन
लैंसडाउन आने वाले पर्यटको ने अगर भुला ताल नहीं घूमा तो माना जाता है की उनका लैंसडौन यात्रा अधूरी रहती है, जंगलों के बीच भुला ताल मानो यहाँ प्रकृति अपना श्रृंगार कर रही हो, देश विदेश से आने वाले पर्यटक भु्ला ताल आकर प्रकृति को काफी करीब से महसूस करते है, यदि मसूरी को पहाड़ो की रानी कहा जाता है तो लैंसडाउन पहाड़ो के किसी राजा से कम नही लगता , बांज बुरास के घने वृक्षों के बीच बसे लैंसडाउन आने वाले पर्यटक भु्ला ताल में बोटिंग का लुत्फ़ उठाना भी नही भूलते, यही नहीं एक सर्वे के मुताबिक भु्ला ताल झील जल सँरक्षण में भी अपनी अहम भूमिका निभा रही है और लैंसडौन में पर्यटकों की सबसे पसंदीदा जगह बनती जा रही है, भु्ला ताल जहां प्रकृति अपना श्रृंगार करती है, लैंसडाउन उत्तराखंड के ख़ूबसूरत पर्यटक स्थलों में से एक और गढ़वाल रायफल रेजिमेंट का मुख्यालय है, लैंसडाउन को पहले कालोडांडा नाम से जाना जाता था,ब्रिटिश काल के दौरान सन 1886 में अंग्रेज शासको नें गढ़वाल रेजिमेंट की स्थापना कर यहाँ उसका मुख्यालय बनाया था , अंग्रेज शासको ने कालोडांडा का नाम लोर्ड लैंसडाउन के नाम पर इसका नाम लैंसडाउन रखा , लैंसडाउन गढ़वाल रेजिमेंट सेंटर का मुख्यालय होने के साथ ही एक ख़ूबसूरत पर्यटक स्थल है और कुदरत ने इस पहाड़ी नगर को नायब तोहफा दिया है , गढ़वाल रेजीमेंट के जवानों ने साल 2003 में भु्ला समेत दो और अन्य चैक डेमो का निर्माण किया लेकिन सुविधाओं की वजह से भु्ला ताल ही पर्यटकों की पहली पसंद बन सका, भु्ला ताल जंगलों के बीच 140 x 40 वर्ग मीटर फैली झील है जिसमें पर्यटक बोटिंग का लुत्फ़ उठाना नहीं भूलते है, स्थानीय लोगो के मुताबिक भु्ला ताल लैंसडौन के लिए पर्यटकों की पहली पसंद बन गयी है जबकि स्थानीय लोगो के लिए रोज़गार का एक बेहतर जरिया भी है ।
पर्यटकों की पहली पसंद लैंसडाउन
भु्ला ताल लैंसडौन के लिए पर्यटकों की पहली पसंद तो है ही इसके साथ ही लैंसडौन और आस पास के प्राकृतिक जल स्रोतो को नया जीवन दान भी प्रदान कर रही है, भु्ला ताल के जल संचय करने की समता करीब 32 लाख गैलन है, भु्ला ताल में पूरे साल भर पानी इक्क्ठा रहता है जिससे कई सुख गए प्राकृतिक जल स्रोत पुनर्जीवित हो गए है और लैंसडौन में हमेशा हरियाली छाई रहती है ।
भु्ला नाम क्यों
भु्ला ताल का नाम भु्ला रखे जाने की भी एक खास वजह है, गढ़वाल राइफल के जवानों ने भु्ला झील का निर्माण करवाया था, गढ़वाली भाषा में छोटे भाई को प्यार से भुला यानि छोटा भाई कहा जाता है और गढ़वाल रेजीमेंट के अफसर अपने रिक्रूट को भुला कहकर पुकारते है जिसकी वजह से इस झील का नाम भु्ला रख दिया , 9 गढ़वाल राइफल और 11 गढ़वाल राइफल के जवानों ने इस झील के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी ।

पहाड़ों में जल संरक्षण को लेकर वैज्ञानिकों से लेकर पर्यावरणविद हमेशा से ही चिंता जताते रहे है, इसे स्वार्थ की पराकाष्ठा कहा जा सकता है की उत्तराखंड में रची बसी जल संरक्षण की परंपरा पर केवल चिंता ही जताई गयी, गढ़वाल रेजीमेंट के जवानों के अथक प्रयास ने भु्ला ताल का निर्माण कर पहाड़ों में जल संरक्षण को लेकर चिंता जताने वाले लोगो को आइना दिखाने का काम किया है, गढ़वाल रेजीमेंट के जवानों के अथक प्रयास से बनायीं गयी भु्ला ताल आज पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र तो है ही साथ में लैंसडौन के एक बड़े इलाके में मृत हो चुके प्राकृतिक जल स्रोतो को नया जीवनदान देने के लिए वरदान भी साबित हुई है ।