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नवरात्र : वन अनुसंधान केंद्र में बनी देवी वाटिका

यदि आप भी देवियों से जुड़े वृक्षों के बारे में जानकारी लेने चाहते हैं तो एफटीआई हलद्वानी चले आइये और देवी माँ को प्रसन्न करने वाले पौधे लेकर जायें, अगले 9 दिनों में माता रानी की अलग अलग रूप की पूजा होगी, यूँ तो पीपल के पेड़ का हर पूजा में महत्वपूर्ण स्थान है लेकिन हल्द्वानी वन अनुसंधान केंद्र ने एक देवी वाटिका तैयार की है जिसमें माता रानी से जुड़े और उनको पसँद आने वाले पौंधों को लगाया गया है, जिसमें मुख्यतः नीम, केला, आंवला, गुड़हल शामिल है……मान्यताओं के मुताबिक दुर्गा माता की पूजा में नीम, सरस्वती माता की पूजा में आंवला, लक्ष्मी माँ की पूजा में केला और काली मां की पूजा में गुड़हल का महत्व है, इसके अलावा देवियों की पूजा में इस्तेमाल होने वाले तुलसी, हरश्रृंगार यानी पारिजात, रक्त चंदन, चन्दन के पौधों को भी यहां लगाया गया है, एफटीआई रेंजर मदन सिंह बिष्ट के मुताबिक इन पौधों का हमारे जीवन मे बड़ा औषधीय महत्व है, चंदन, रक्त चंदन, पारिजात जैसे पौंधों पर यहां शोध कार्य भी चल रहा है और इनको संरक्षित करने का भी प्रयास चल रहा है,

शमी का पौधे का भी पूजा में महत्व:

हर पूजा हवन में शमी के पौधे का बहुत महत्व है, माना जाता है की शनि देव को खुश करने के लिए घर मे खासकर दशहरे के दिन इसका पौधा लगाना शुभ होता है, शमी के पेड़ का वर्णन महाभारत काल में भी मिला, माना जाता है की 12 साल के वनवास के बाद अज्ञातवास के दौरान पांडवो ने अपने अस्त्र-शस्त्र इसी पेड़ पर छुपाये थे , जिसमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी शामिल था, माना जाता है की जो भी इस वृक्ष की पूजा करता है उसे शक्ति और विजय प्राप्त होती है , शनि ग्रह के दुष्प्रभाव को भी इस पौंधे से कम किया जा सकता है ।

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